Sunday, February 25, 2018

महत्व की परिभाषा सूर्य .


क्या पारिभाषित करती है?
कल्पना सूर्य की , सूरज को.

सूरज जब जन्मा तो 
भूगर्भा मुस्काती थी 
अंकुरित बीज को सहेजे 
नाजुक दो पत्ते और एक शिखा 
पलकों के ऊपर मांगटीके सा 
ऐश्वर्यमान था सूर्य.

सूरज की  बाल्यावस्था में 
खेतों की मेड़ो पे , दो रह चलते 
सांप जैसे पगडंडियों पे
उंगलिया थामे दौड़ा था सूर्य.
कोडक की नेगेटिव फिल्मो पर 
ये शालीनता कितनो ने समेटी है.
पितरो के संस्कार का पहला उर्धद्वार था सूर्य.

सूर्य को पसंद नहीं की
कोई बादल दो टूक 
पसर जाये एक ज़िद्द पे 
सूर्य को तो चढ़ने है कितने पर्वत पहाड़
पार जाने है कितने नदी नाले जंगल-विराज 
और सामने ये एक बित्ते का मेघ खंड 
की काटना 
वक़्त नहीं की चढ़ जाये और मसल दे 
दो नन्हें मुठियों में.
उबाज में आके सूर्य को 
रास्ता बदलना 
आगे बढ़ना आता है.

सूरज की लड़कपन में 
शरारती इतना की परेशान हो जाती है , अक्षिता माँ.
कभी बगीचे में कभी छत पे  तो
कभी चिंया मुंडेर पर आता था सूर्य.
मिलने सूर्य को.
कभी गुलेल पे तना कंचे जितना सटीक था सूर्य
नीम की निम्बोली और कच्चे आम के टिकोले 
इतना स्वाद इतना श्वेताभ 
की टूटे दांत और निश्छल हसी के पीछे दमकता था सूर्य.

कभी क्रिकेट की बॉल
कभी कब्बडी का अंपायर 
और फुटबॉल बन 
कोंसो दूर दौड़ना सिखाता था सूर्य.

जब था यौवन 
सूर्य था बिल्कुल ओजस्व से परिपूर्ण 
तेजस्वी उसकी किरणे इतनी की
 पड़ किसी मृग पे 
तो कस्तूरी और विस्तृत हो जाये 
हिरन को दासता से दामन छुड़ाना सीखता है सूर्य.

सूर्य बचपन भी था, सूर्य यौवन भी  
सूर्य अधेड़ भी होगा और बूढ़ा भी.
एक दिन सूर्य डूबेगा 
और कमज़ोर फेफड़ो के xray पर आज धुंधलाता है सूर्य.

जन्म पूरब 
यौवन उर्धव हुआ 
एक विप्लव की आशा थी
पश्चिम कुछ शांत-सा हैं.

 -कृष्णा राय 
मार्च २०, २०१६ 


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