उस रात की कतई सुबह नही हो सकती।
उस दहलान क्षण के एक-एक दृश्य
तोड डालते है मेरें हृद्य के एक-एक तार।
हालाँकि ऐसा पहले कभी नही हुआ
और ऐसे क्षणों के कण-कण का
हिसाब मैनें काफी पहले कर रखा है।
वैसे आम दिनों की तरह ही थी
उस रात की सुबह भी
फोन की तीसरी घनघनाहट के साथ
चुप होनें का संकेत भी आम था,
और निकलने से पहले छोटी बहन की नजरें
गडी थी मुझ पर, जो जाने का सबब जानने
भर का था बस !
गंत्वय के उठगें दरवाजें धकेलेनें बर बाद
वों दृश्य मेरे सामनें थे
जो बार बार अब इन चक्षुओं में जाग उठतें हैं।
उन दृश्यों में भले ही कोई मादरजात मेमनी फसीं थी
किसी भेडियें के पंजो के बीच
बार बार मरी वह इस दौरान , और
छठा जिबह की छुरी फेर रहा था
जब मैं वहाँ पहूँचा था।
कायदे से मेरे अंतः पशु को जागना चाहिये था
नोचना चाहिये था, खसोटना चाहिये था
बाकी बची उस मांस को बाहों में भर
जी-भर कर रौंदना चाहिये था।
पर नही ...
मेरी थिरकती नजर
आपाद होती मस्तक तक पहुँचती
उस-से पहले उसके चेहरे, फिर
उसकी आँखौं पर गड गई।
लगा, लगा कही ये वों तो नहीं
सोती आत्मा को झटकें से उठा
मैं पलट गया ।
उस रात कें बाद कि कितनी रातें बीत गई
पर मेरें लिये उस रात की सुबह हुई नही।
और जब भी देखता हूँ छोटी बहन की आँखें
सन्न सें वों नजरें परिलक्षित हों पूछती हैं यहीं
तुम नही बनें जानवर पर यें तो बताओ
जब तुम रहें मानव हीं
तों क्यों नहीं उखाडा उन कीलित नखों
को मेरे शरीर सें
क्यों आखिर क्यों
तुमनें मुझें बचाया नही ?
कृष्णा राय ( March 30th 1999)
2 comments:
हम सबसे सवाल पूछती है यह कविता।
कभी जाने में कभी अनजाने में हमारे भीतर जो जानवर प्रवेश करता है उसका माखौल भी उड़ाती है कविता।
आपकी लेखनी किसी भी संवदेनशील आदमी को परेशान कर सकती है। बधाई
धन्यावाद,
काफी तसल्ली मिली आपकी प्रतिकिया पाकर। हिम्मत भी मिली।
कविताऐं लिख कर खुद को और बेहतर इन्सान बनाने कि कोशिश में जुटा हुँ। बस चाहता हुँ एक इन्सान के तौर हर वो मानवयी पेहलुओ को छु संकू जो कि आज कल कि भौतिकतावाद में कहीं गुम् होतीं जा रही हैं।
आपकी मार्ग दर्शक प्रतिकियाऐं हमेशा मिलती रहेंगी यही चाहता हूँ ।
कृष्णा
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