मै सन्जोये रखना चाहता हूँ
उस पार के दृश्य
एक अमिट छाप की तरह
हृद्य के किसी कोने मे
उस पार के दृश्य।
उन दृश्यो से पहले
उगते गोबरछत्ते गगनचुम्बि
के ओट मे आते जा रहे,
उस पार के दृश्य।
भले टीस देते मुझे वे
परन्तु हृद्य कपाट के बसे दृश्य
तुरन्त सहला घावो पर मरहम लगा जाते
उस पार के दृश्य।
उन दृश्यो, उस पार के दृश्यो मे
सुनहली सजल धरती
ताड गम्हार की लम्बी फेहरिस्त
और झुरमूटो के पिछे उदीयमान सुर्य
उस पार के दृश्य।
इनका हृद्य मे सन्जोना
कुकुरमुतो का दरख्तो से ऊचाँ होना
और उगते सुरज का लुप्त होना
याद दिलाते है मुझे
उस पार के दृश्य।
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ये कविता मैने जुन सन् १९९९ मे अपने घर के सामने बानते विशाल अपार्टमेन्ट पर लिखी थी. कैसे मेरे नजरो के सामने की पूरी जमीन और आकाश छीन लिया गया था, और कैसे मैने उन यादो को अपने दिल और शब्दो मे पिरोया और सम्भावनाये बनाये रखी ऊन यादो को बार बार याद रखने की।
*कुकुरमुत्ते और गोबरछत्ते उसी विशाल अपार्टमेन्ट को चिह्नित करते है।
-Krishna Rai ( 1st june 1999)
1 comment:
क्रांकीट के जंगलों ने हमसे पहले भी बहुत कुछ छीना है। हमारे पेड़, हमारी सांसे, हमारे हिस्से की रोशनी। आपकी चिन्ता जायज। यह कविता भी जबरदस्त है। यूं ही लिखते रहे।
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