( पिता का पुत्र को एक सही सोच और दिशा दिख।ने का प्रयास )
पुत्र , मेरे पुत्र !
सोचो , सोचो की
तुम्हारा उद्भव क्यूँ हुआ ?
कौन से कारक उत्तरदायी थे
तुम्हारे भ्रूण निर्माण में ?
आखिर तुम अपनी माता के
उदरस्थ क्यूँ हुए ?
फिर अन्तस्थ:
तुम्हारे स्वः का
भुमिस्थापन क्यूँ हुआ ?
ये भी कि इस असीमित व्योम के किस
मुहाने तुम्हारा प्रदार्पण हुआ ?
पुत्र मैं कृष्ण
सोचो तुम अभिमन्यु
भाग्य तुम्हारा जो पुरुष्तव तुमने धरा
पर सोचो तो स्त्रीत्व का काम भला ?
ये भी कि पुन्ग्सत्व का पंगु होना
स्त्रीत्व का ढील देना
और पसीजते पुलिंग को
पसीज शरण देना...
ये दया है या दरिद्रता ?
या हैं ये एक अपेक्षा
एक का दुसरे के प्रति इच्छा ?
पुत्र ये तुम्हारा पुरुषार्थ
समझो इससे मलिनता
या ईश्वरीय अनौपचारिक स्निग्धता
या पंचतात्विक शरीर से चटकते
ओज को चाटने कि जिजीविषा.
सोचो तो ये भी
सोचते रहो तब तक
मस्तिस्क सोचने कि सीमाए
तोड़ता नहीं जब तक.
सोचो कि असीमित आकाश का
अव्यक्त विशालतम आकार
गोल क्यूँ है ?
भले तुमने गर्भ में ही सीखा
व्यूह विध्वंश कि कला
पर सोचो तो गार्भिक होने कि कला
तुमने सीखी कहा से ?
स्वास्तित्विक विवेचना यदयपि
तुम न चाहो
पर पितरो के द्वारा
मात्र एक लौ उगाने की
मात्र एक सांध्य दीप जलाने कि
सार्वभौमिक विद्या
सोचो मुझमे कहा से आई ?
अपने मानस मन को दौडाओ तो
इस एक छत्र गगन में
नथुने फुलाओ उन्मुक्त ठंडी स्वाश
भरो अपने तन में
हृदयस्थ धड़कते हृदय को धर
पूछो हरेक नछत्र से.
धरा को चुमते क्षितिज
इर्द गिर्द घूमते चन्द्र से
एक का दुसरे के प्रति
पौरुष का सतीत्व से
ये नेसर्गिक आकर्षण कैसा ?
-Krishna Rai ( 3rd october 2002 )
1 comment:
यह कविता थोड़ी आध्यामिकता के भाव की तरफ चली गई है, फिर भी अच्छी बन पड़ी है।
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