दिन बीतें अब सांझ
और आखिरी पहर
की दो घडी रात
और तुम अपने हथेलियों से थपथपाती
तो हरसिंगार के फूलों पे
ढलने लगती नींद.
जब तुम अपने हथेलियों से सहलाती तो
शिशिर का चन्द्रमा भी
अमावास की काली चादर तान
हो जाता ओझल.
तुम जब अपने हथेलियों से जगाती
तो गा रही होतीं गौरैयाँ
तुलसी के मुंडेर पर
और चारों दिशाओं में
छाने लगती पीली धुप.
इस भरी रात में
हमेशा साथ होती है , तुम्हारी हथेलियाँ
गुजरते खवाबों के सन्नाटों में
खनकती तुम्हारी हथेली
और कलायिओं पर सजती चूडिया.
तुम जब हथेलियों से बुलाती
तो सिमट आता सारा आसमान
तुम्हारी देहरी के बाहर.
तुम्हारी हथेलियों का स्पर्श
जो चेहरे और होंठो को
छू जाती
भर जाती मेरी दामन
जगा जाती मुझमे
वर्षा की पहली बूँद से महकती
धरा की सौंधी महक.
और,
मेरे समक्ष जब तुम
फैलाती जो अपनी
नन्ही हथेलियाँ
तो फिर से जी उठता
जीवन.
कृष्णा राय
(sometime in 2000)
-Krishna Rai
Copyright@2017
और आखिरी पहर
की दो घडी रात
और तुम अपने हथेलियों से थपथपाती
तो हरसिंगार के फूलों पे
ढलने लगती नींद.
जब तुम अपने हथेलियों से सहलाती तो
शिशिर का चन्द्रमा भी
अमावास की काली चादर तान
हो जाता ओझल.
तुम जब अपने हथेलियों से जगाती
तो गा रही होतीं गौरैयाँ
तुलसी के मुंडेर पर
और चारों दिशाओं में
छाने लगती पीली धुप.
इस भरी रात में
हमेशा साथ होती है , तुम्हारी हथेलियाँ
गुजरते खवाबों के सन्नाटों में
खनकती तुम्हारी हथेली
और कलायिओं पर सजती चूडिया.
तुम जब हथेलियों से बुलाती
तो सिमट आता सारा आसमान
तुम्हारी देहरी के बाहर.
तुम्हारी हथेलियों का स्पर्श
जो चेहरे और होंठो को
छू जाती
भर जाती मेरी दामन
जगा जाती मुझमे
वर्षा की पहली बूँद से महकती
धरा की सौंधी महक.
और,
मेरे समक्ष जब तुम
फैलाती जो अपनी
नन्ही हथेलियाँ
तो फिर से जी उठता
जीवन.
कृष्णा राय
(sometime in 2000)
-Krishna Rai
Copyright@2017