Saturday, November 20, 2010

उस रात की सुबह

उस रात की कतई सुबह नही हो सकती।
उस दहलान क्षण के एक-एक दृश्य
तोड डालते है मेरें हृद्य के एक-एक तार।

हालाँकि ऐसा पहले कभी नही हुआ
और ऐसे क्षणों के कण-कण का
हिसाब मैनें काफी पहले कर रखा है।

वैसे आम दिनों की तरह ही थी
उस रात की सुबह भी
फोन की तीसरी घनघनाहट के साथ
चुप होनें का संकेत भी आम था,
और निकलने से पहले छोटी बहन की नजरें
गडी थी मुझ पर, जो जाने का सबब जानने
भर का था बस !

गंत्वय के उठगें दरवाजें धकेलेनें बर बाद
वों दृश्य मेरे सामनें थे
जो बार बार अब इन चक्षुओं में जाग उठतें हैं।
उन दृश्यों में भले ही कोई मादरजात मेमनी फसीं थी
किसी भेडियें के पंजो के बीच
बार बार मरी वह इस दौरान , और
छठा जिबह की छुरी फेर रहा था
जब मैं वहाँ पहूँचा था।

कायदे से मेरे अंतः पशु को जागना चाहिये था
नोचना चाहिये था, खसोटना चाहिये था
बाकी बची उस मांस को बाहों में भर
जी-भर कर रौंदना चाहिये था।

पर नही ...
मेरी थिरकती नजर
आपाद होती मस्तक तक पहुँचती
उस-से पहले उसके चेहरे, फिर
उसकी  आँखौं पर गड गई।

लगा, लगा कही ये वों तो नहीं
सोती आत्मा को झटकें से उठा
मैं पलट गया ।

उस रात कें बाद कि कितनी रातें बीत गई
पर मेरें लिये उस रात की सुबह हुई नही।
और जब भी देखता हूँ छोटी बहन की आँखें
सन्न सें वों नजरें परिलक्षित हों पूछती हैं यहीं

तुम नही बनें जानवर पर यें तो बताओ
जब तुम रहें मानव हीं
तों क्यों नहीं उखाडा उन कीलित नखों
को मेरे शरीर सें
क्यों आखिर क्यों
तुमनें मुझें बचाया नही ?


कृष्णा राय ( March 30th 1999)

उस पार के दृश्य

मै सन्जोये रखना चाहता हूँ
उस पार के दृश्य
एक अमिट छाप की तरह
हृद्य के किसी कोने मे
उस पार के दृश्य।

उन दृश्यो से पहले
उगते गोबरछत्ते गगनचुम्बि
के ओट मे आते जा रहे,
उस पार के दृश्य।

भले टीस देते मुझे वे
परन्तु हृद्य कपाट के बसे दृश्य
तुरन्त सहला घावो पर मरहम लगा जाते
उस पार के दृश्य।

उन दृश्यो, उस पार के दृश्यो मे
सुनहली सजल धरती
ताड गम्हार की लम्बी फेहरिस्त
और झुरमूटो के पिछे उदीयमान सुर्य
उस पार के दृश्य।

इनका हृद्य मे सन्जोना
कुकुरमुतो का दरख्तो से ऊचाँ होना
और उगते सुरज का लुप्त होना
याद दिलाते है मुझे

उस पार के दृश्य।

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ये कविता मैने जुन सन् १९९९ मे अपने घर के सामने बानते विशाल अपार्टमेन्ट पर लिखी थी. कैसे मेरे नजरो के सामने की पूरी जमीन और आकाश छीन लिया गया था, और कैसे मैने उन यादो को अपने दिल और शब्दो मे पिरोया और सम्भावनाये बनाये रखी ऊन यादो को बार बार याद रखने की।
*कुकुरमुत्ते   और गोबरछत्ते उसी विशाल अपार्टमेन्ट को चिह्नित करते है।
 
-Krishna Rai ( 1st june 1999)

कृष्ण और अभिमन्यु

( पिता का पुत्र को एक सही सोच और दिशा दिख।ने का प्रयास )

पुत्र , मेरे पुत्र !
सोचो , सोचो की
तुम्हारा उद्भव क्यूँ हुआ ?
कौन से कारक उत्तरदायी थे
तुम्हारे भ्रूण निर्माण में ?

आखिर तुम अपनी माता के
उदरस्थ क्यूँ हुए ?
फिर अन्तस्थ:
तुम्हारे स्वः का
भुमिस्थापन क्यूँ हुआ ?
ये भी कि इस असीमित व्योम के किस
मुहाने तुम्हारा प्रदार्पण हुआ ?

पुत्र मैं कृष्ण
सोचो तुम अभिमन्यु
भाग्य तुम्हारा जो पुरुष्तव तुमने धरा
पर सोचो तो स्त्रीत्व का काम भला ?

ये भी कि पुन्ग्सत्व का पंगु होना
स्त्रीत्व का ढील देना
और पसीजते पुलिंग को
पसीज शरण देना...
ये दया है या दरिद्रता ?
या हैं ये एक अपेक्षा
एक का दुसरे के प्रति इच्छा ?

पुत्र ये तुम्हारा पुरुषार्थ
समझो इससे मलिनता
या ईश्वरीय अनौपचारिक स्निग्धता
या पंचतात्विक शरीर से चटकते
ओज को चाटने कि जिजीविषा.

सोचो तो ये भी
सोचते रहो तब तक
मस्तिस्क सोचने कि सीमाए
तोड़ता नहीं जब तक.

सोचो कि असीमित आकाश का
अव्यक्त विशालतम आकार
गोल क्यूँ है ?


भले तुमने गर्भ में ही सीखा
व्यूह विध्वंश कि कला
पर सोचो तो गार्भिक होने कि कला
तुमने सीखी कहा से ?

स्वास्तित्विक विवेचना यदयपि
तुम न चाहो
पर पितरो के द्वारा
मात्र एक लौ उगाने की
मात्र एक सांध्य दीप जलाने कि
सार्वभौमिक विद्या
सोचो मुझमे कहा से आई ?

अपने मानस मन को दौडाओ तो
इस एक छत्र गगन में
नथुने फुलाओ उन्मुक्त ठंडी स्वाश
भरो अपने तन में
हृदयस्थ धड़कते हृदय को धर
पूछो हरेक नछत्र से.

धरा को चुमते क्षितिज
इर्द गिर्द घूमते चन्द्र से
एक का दुसरे के प्रति
पौरुष का सतीत्व से

ये नेसर्गिक आकर्षण कैसा ?

-Krishna Rai  ( 3rd october 2002 )