Sunday, May 23, 2010

हमारें दरमयान (Old Poem - year 1999 14th oct )

मैं और मेरी
छोटी सी दुनिया
के बीच.
सब कुछ नपा - तुला सा है.

थोड़ी सी बैचैनी
थोडा धुवां धुवां-सा है.

अजीब-सी कसक ,
और हर कस्स -के बाद
फिर नीला-नीला जहाँ-सा है.

मै मदमस्त हूँ ...
उसकी बाँहों में
जलते होंठो को होंठो पर रख
सुलगते जिस्म को बाँहों मे भर
झांकता हूँ उसकी आँखों में ---
उसकी आँखों मैं ऐसा नशा-सा है.

मैं, मेरी दुनिया और हमारे दरमयान
कुछ भी नहीं,
सिर्फ मेरा जिस्म और उसका जिस्म
गरमाती साँसों मे चूमती है , वो
मेरी ठंडी आहें ,

गर्म सांस और ठंडी आंह में
एक रिश्ता-सा हैं.

हम हमेशा मिलते है
रात के किसी कोने में.
हम सोतें नहीं,
वों मुझको मैं उसको
सहलाते-सम्हालते
सिर्फ प्यार करते हैं.

इस सहलाने,
प्यार करने में
कुछ पिघलता-सा हैं.

तिल-तिल कर जलते है हम
रात ढलनें तक ,
हर एक अंग
टूट-ता बिखरता जाता है.
उसकी खुशबूं , शरीर की हर एक महक
सीने में भरता ,
अवशेषों को उंगलियों  से धरता
तलाशता हूँ उसे,
 उसकी राख में...

उसकी राख में कुछ अपना-सा हैं.

-Krishna Rai 

*hint : This special poem i wrote for the first cigret i smoke when i was seventeen.